Ateet Ki Pagdandiya

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“.....व्यक्ति जैसे जैसे उम्र के आखिरी पडाव की ओर बढता है वैसे वैसे उसके जन्म, शैशव, बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था आदि के अतीत के माटी की जडें पुकारती हैं, पर प्राय: वह पुकार को गम्भीरता से नहीं सुनता है, कोई विरला ही उन अतीत की पगडंडियों की ओर लौटता है । अधिकतर लोग सुविधा की जकडी जंजीरों में मन मसोस कर महानगरों में बने रहते है । ऐसे में लोगों के मस्तिष्क के यह घर करना आवश्यक है कि वे पुरानी परम्परायें भली ही होती हैं जो इंसान को इंसान बनाए, संतोष और सुकून का जीवन जीना और परिवार , समाज , स्त्री , प्रकृति और धरा के प्रति संवेदनशील और सहृदय रहना सिखाये, हो सकता है कि यह हमारी व्यक्तिगत राय या धारणा हो । वह समय कितना सुखद होगा जब शहरों अथवा विदेशों में काम करने वाले लोग रिटायर होकर अपने जन्मभूमि या अपने जडों की ओर लौट आयें, इससे दों सुंदर बातें होगी, पहली बात शहर तथा गाँव में संतुलन स्थापित होगा और दूसरा ऐसे लोगों की उपस्थिति या देखरेख में गाँव का सम्पूर्ण विकास होगा ।......”

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